देवीलाल धाकड़ का विकास सागर: दूसरे पन्ने में सड़कों का ऐसा लेखा-जोखा… जिसे देखकर खामोशी भी सवाल बन जाए..!
गांव की पगडंडियों से एक्सप्रेस-वे तक बना नेटवर्क बता रहा—किस दौर में गरोठ-भानपुरा ने असली रफ्तार पकड़ी..!

पन्ने खुलते हैं तो दावे नहीं, काम बोलता है”
गरोठ एक्सप्रेस न्यूज़
गरोठ-भानपुरा की राजनीति में अक्सर वि
इस पन्ने को गौर से देखने पर साफ समझ आता है कि क्षेत्र में सड़क विकास किस दौर में अपनी असली रफ्तार पर था। यह सिर्फ योजनाओं की सूची नहीं है, बल्कि उन कामों का पूरा हिसाब है जो जमीन पर उतरकर लोगों की जिंदगी बदल गए।
एक समय था जब गरोठ-भानपुरा के कई गांव सिर्फ कच्ची पगडंडियों और धूल भरे रास्तों पर निर्भर थे। बारिश आते ही रास्ते टूट जाते थे, और सफर एक चुनौती बन जाता था। लेकिन इसी क्षेत्र ने वह दौर भी देखा जब गांव-गांव तक पक्की सड़कों का जाल बिछा और यह सब विकास सागर के इस पन्ने में दर्ज है।
प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत दूरस्थ गांवों को मुख्य मार्गों से जोड़ना हो, या पुराने रास्तों को चौड़ा और मजबूत बनाना हर स्तर पर काम हुआ। यह बदलाव सिर्फ सड़क का नहीं था, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का था। जहां पहले घंटों लगते थे, वहां अब मिनटों में सफर तय होने लगा।
इस पन्ने में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि कई किलोमीटर लंबी सड़कों का निर्माण और उन्नयन किया गया। करोड़ों रुपये की लागत से बने ये मार्ग आज भी उस दौर की गवाही दे रहे हैं। खास बात यह है कि यह सब सिर्फ कागजी वादों तक सीमित नहीं रहा बल्कि जमीन पर दिखाई देता है, महसूस होता है।
इतना ही नहीं, क्षेत्र को बड़े हाईवे और एक्सप्रेस-वे से जोड़ने का काम भी इसी समय मजबूती से किया गया। इससे गरोठ-भानपुरा की पहचान सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह बड़े शहरों और व्यापारिक मार्गों से जुड़ गया। इसका सीधा असर स्थानीय व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर पड़ा।
आज जब विकास सागर का यह दूसरा पन्ना सामने आता है, तो यह किसी भाषण की तरह नहीं, बल्कि एक दस्तावेज की तरह बात करता है। इसमें न तो आरोप हैं, न ही जवाब लेकिन जो लिखा है, वही काफी है समझने के लिए।
लोगों के बीच अब यह चर्चा नहीं, बल्कि एक तुलना बन चुकी है जहां शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। क्योंकि जब एक पन्ना ही इतना कुछ बता दे, तो बाकी बातें अपने आप पीछे छूट जाती हैं।
यह पन्ना सिर्फ अतीत का जिक्र नहीं करता, बल्कि वर्तमान को भी एक आईना दिखाता है। फर्क साफ है, नजर चाहिए और शायद यही वजह है कि यह दूसरा पन्ना आज इतना भारी पड़ता नजर आ रहा है।
गरोठ-भानपुरा की जनता के लिए यह सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, बल्कि उस दौर की याद है जब विकास महसूस होता था, नजर आता था, और लोगों की जिंदगी में बदलाव लाता था।


